Saturday, 18 February 2017

राज़



 न जाने वो कौन सा अन्जाना राज़ है                                
 जो छिपके मैं  ढूँढू तेरी नजरों में  
न जाने वो कौन सा अन्जाना राज़ है
जो तुझमे-मुझमे ही उलझा रहता   
न जाने वो कौन सा एहसास है 
जिसने मेरे दिल को तुझसे हैं जोड़ा 
उम्रें हे बीती तुम्हे  ढूंढ़ते-ढूंढ़ते
आज आ खड़ी हूँ मै तेरे डोर पे 
फिर उस राज़ की खोज़ में 
न जाने वो कौन सा अन्जाना राज़ है
जो जुदा होकर भी जुदा न करता 
इंतज़ार है मुझे तेरे उन लब्ज़ों का 
जो भर दे मेरी आँखें तेरे ख्वाब से
न जाने वो कौन सा अन्जाना राज़ है
जो मुझे हर पल तेरी ही ओर खींचता 
रब से रहे मेरी यही गुज़ारिश
जोड़ दे हमें इस राज़ कि बुनियाद से
भर दे मेरी ज़िंदगी तेरे साये से 
न जाने वो पल है कितना दूर 
जब तेरे रस्ते ताकेंगे मेरे कदम!